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परसा का बारातघर: आठ साल से छत का इंतज़ार, सिस्टम की ढिठाई ने बनाया खंडहर

विकास की 'अधूरी' तस्वीर: दीवारों पर घास, आंगन में सन्नाटा; परसा के बारातघर पर ग्रहण

।। सिस्टम की ‘छत’ गायब: 8 साल, एक खंडहर और जिम्मेदारों की बेशर्मी।।

अजीत मिश्रा (खोजी)85d60b86 8e32 4447 ad64 2aecdaea64b4 1773403576687

बस्ती। सरकारी फाइलों में विकास की गंगा भले ही बह रही हो, लेकिन कप्तानगंज ब्लॉक के ग्रामसभा दूधौरा (परसा) में विकास का एक ढांचा पिछले आठ वर्षों से अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। सांसद निधि से शुरू हुआ बारातघर आज ग्रामीणों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि ‘सरकारी नाकामी’ का एक कंक्रीट का स्मारक बन चुका है।49047edb 9d5d 4ab6 8452 437196f7ace3 1773403576683

💫गरीबों के अरमानों पर फिरता पानी

इस बारातघर की बुनियाद इसलिए रखी गई थी ताकि गांव के गरीब परिवारों को अपनी बेटियों की शादी के लिए बस्ती शहर के महंगे मैरिज हॉलों के सामने हाथ न फैलाने पड़ें। लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी यह भवन अधूरा है। दीवारें खड़ी हैं, पर छत नदारद है। छत के अभाव में भवन के भीतर अब खुशियों की शहनाई नहीं, बल्कि जंगली घास-फूस और सन्नाटा पसरा है।c03a21ef 8d14 491d 8cc9 a89fb9be63dd 1773403576685

💫बजट का ‘रोना’ और जिम्मेदारी से ‘तौबा’

हैरानी की बात यह है कि जब ग्रामीण अपनी समस्या लेकर अधिकारियों के पास जाते हैं, तो उन्हें ‘बजट खत्म होने’ का रटा-रटाया जवाब पकड़ा दिया जाता है। वीडीओ कप्तानगंज, चंद्रभान उपाध्याय का यह कहना कि ‘ब्लॉक स्तर से इसका सीधा प्रावधान नहीं है’, साफ दर्शाता है कि विभाग अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने में माहिर है। सवाल यह है कि अगर बजट नहीं था, तो जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा दीवारों में क्यों फूंका गया? क्या यह सरकारी धन की खुली बर्बादी नहीं है?dea8eafe dcb4 4bb8 8593 2650207f23c2 1773403672375

💫आईजीआरएस: आश्वासन का झुनझुना

गांव के सुरेश चंद्र मिश्र जैसे जागरूक नागरिकों ने मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल (IGRS) का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन वहां से भी केवल ‘शिकायत ट्रांसफर’ होने का डिजिटल खेल ही देखने को मिला। जमीन पर पत्थर की एक ईंट भी नहीं हिली।

ग्रामीणों का दर्द: “आठ साल से हम बस ढांचा देख रहे हैं। आज भी हमें मजबूरी में शहर के महंगे हॉल बुक करने पड़ते हैं। हमारे लिए सरकार की योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।”

💫बड़ा सवाल

आखिर इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, क्योंकि बिना छत के खड़ी ये जर्जर दीवारें अब खंडहर बनकर किसी भी दिन गिर सकती हैं। परसा के ग्रामीणों की मांग सरल है— उन्हें आश्वासन नहीं, छत चाहिए।

💫मुख्य बिंदु जो लेख को धार देते हैं:

⭐समय सीमा: 8 साल का लंबा इंतजार।

⭐आर्थिक बर्बादी: सांसद निधि के पैसे का दुरुपयोग।

⭐अधिकारियों का रवैया: जिम्मेदारी दूसरे विभागों पर टालना।

⭐हादसे का डर: जर्जर ढांचे से जान-माल के खतरे की आशंका।837aa63b df52 4ef5 8af8 1e6adccbf536 1773403576688

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